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क्षमता की सोच

सितम्बर 29, 2009
पुराने जो न कह सके से नये चिट्ठे का सफर
बचपन से ही जाने किन बातों की वजह से मेरे मन में जो अपनी छवि बनी थी उसमें हाथों से कुछ भी काम न कर पाने की भावना थी. यानि सोचने विचारने वाले काम कर सकता था, लिख पढ़ सकता था पर बत्ती का फ्यूज़ उड़ा हो या साईकल का पंक्चर ठीक करना हो, तो मेरे बस की बात नहीं. समय के साथ, यही सोच तकनीकी विषयों के बारे में भी होने लगी. यानि गणित हो, या केलकुलस या ईंजीनियरिंग से जुड़ी कोई बात, यह सब अपनी समझ से बाहर थीं.
पहली बार कम्प्यूटर शायद १९८८ या १९८९ में देखा तो सोचा कि भैया यह तो अपने बस की बात नहीं लगती. तब ईलैक्ट्रोनिक टाईपराईटर से भी मुझे दिक्कत होती थी, टेलेक्स का उपयोग बहुत दूभर सा लगता था. दो तीन साल तक मैं कम्प्यूटर के करीब नहीं गया. मुझे मेरे साथ काम करने वाले बहुत लोगों ने कहा कि कम्प्यूटर से कुछ लिखना टाईपराईटर से अधिक आसान है पर मैं कहता कि मुझे टाईपराईटर की टिप टिप ही पसंद है. फ़िर हमारे दफ्तरवालों नें कम्प्यूटर से लिखने के प्रोग्राम वर्डस्टार का कोर्स का आयोजन किया और कहा कि मुझे उसमें भाग लेना ही पड़ेगा. तब पहली बार कम्प्यूटर को छुआ. तब लगा कि भाई इतना कठिन तो नहीं था, बल्कि आसान ही था.
१९९२ या १९९३ की बात है कि जब ईमेल का प्रयोग होने लगा था. मुझे भी कहा गया कि ईमेल के कोर्स में भाग लूँ, तो मैंने मना कर दिया. कहा कि सैकरेट्री सीख लेगी, मुझसे यह नयी नयी तकनीकें नहीं सीखी जातीं. तब आज के कम्प्यूटरों वाली बात नहीं थी, डास पर कैसे डायरेक्टरी देखी जाये, फारमेट की जाये, कोपी की जाये, सब याद करना पड़ता था.
बदलाव आया १९९४ में जब अमरीका में इंटरनेट देखा, जाना कि लोग ईमेल से हर दिन भारत के समाचार पढ़ सकते थे. वापस इटली आये तो ईमेल इंटरनेट के बारे में सीखा भी, घर के लिए भी कम्प्यूटर लिया और इंडिया मेलिंग लिस्ट से भारत के समाचार पाने लगे.
उसके बाद का बड़ा बदलाव आया २००१ या २००२ के पास जब अपनी बेवसाईट बनाने की सोची. हाँ, न करते करते कई महीने निकल गये, धीरे धीरे एच टी एम एल भाषा को सीखा और सृजन नाम से बेवसाईट बनी जो बाद में कल्पना में बदल गयी. २००५ में इँटरनेट के माध्यम से बने मित्रों ने, विषेशकर देबू ने ब्लाग बनाने में सहायता की, तो वे भी बन गये. धीरे धीरे कल्पना के पृष्ठ फैलते बढ़ते गये.
अब पिछले एक साल से परेशान हूँ. एच टी एम एल से कल्पना के नये पृष्ठ बनाना, कुछ भी बदलाव करना हो तो इतना समय लग जाता है कि कुछ अन्य करने का समय ही नहीं मिलता. जानकार लोग बोले, “यार तुम सी एस एस का प्रयोग क्यों नहीं करते? या फ़िर जुमला या वर्डप्रेस से कल्पना को चलाओ.” देबू और पंकज ने कुछ सलाह दीं. पर मन में वही बात आ जाती कि जाने मुझसे होगा या नहीं, यह नयी तकनीकें कैसे सीखूँगा? अपनी अक्षमता की बात के साथ मन में उम्र की बात भी जुड़ गयी है कि भैया अब अपनी उम्र देखो, अब नयी बातें सीखना उतना आसान नहीं.
खैर न न करते करते भी, सी एस एस पढ़ने लगा हूँ. शुरु शुरु में लगा कि यह तो अपनी समझ से बाहर की बात है, पर अब लगता है कि धीरे धीरे आ ही जायेगी. इसी चक्कर में इधर उधर जुमला, वर्डप्रेस आदि के बारे में कुछ जानकारी ली, तो सोचा कि सबसे आसान काम है इस चिट्ठे को बदलना. कल्पना पर जिस टेम्पलेट पर यह चल रहा है, वह २००६ में बना था, तबसे ब्लाग चलाने की तकनीकों में बदलाव आ गया है और चार सालों में लिखीं ३९६ पोस्ट के भार से बेचारा दबा हुआ है कि नयी पोस्ट जोड़ना कठिन हो गया है. इसलिए यह इस चिट्ठे की आखिरी पोस्ट है. इसके बाद सभी पोस्ट “जो न कह सके” के नये चिट्ठे पर ही होंगी.

पुराने “जो न कह सके” से इस नये चिट्ठे का सफर

“बचपन से ही जाने किन बातों की वजह से मेरे मन में जो अपनी छवि बनी थी उसमें हाथों से कुछ भी काम न कर पाने की भावना थी. यानि सोचने विचारने वाले काम कर सकता था, लिख पढ़ सकता था पर बत्ती का फ्यूज़ उड़ा हो या साईकल का पंक्चर ठीक करना हो, तो मेरे बस की बात नहीं. समय के साथ, यही सोच तकनीकी विषयों के बारे में भी होने लगी. यानि गणित हो, या केलकुलस या ईंजीनियरिंग से जुड़ी कोई बात, यह सब अपनी समझ से बाहर थीं.

पहली बार कम्प्यूटर शायद 1988 या 1989 में देखा तो सोचा कि भैया यह तो अपने बस की बात नहीं लगती. तब ईलैक्ट्रोनिक टाईपराईटर से भी मुझे दिक्कत होती थी, टेलेक्स का उपयोग बहुत दूभर सा लगता था. दो तीन साल तक मैं कम्प्यूटर के करीब नहीं गया. मुझे मेरे साथ काम करने वाले बहुत लोगों ने कहा कि कम्प्यूटर से कुछ लिखना टाईपराईटर से अधिक आसान है पर मैं कहता कि मुझे टाईपराईटर की टिप टिप ही पसंद है. फ़िर हमारे दफ्तरवालों नें कम्प्यूटर से लिखने के प्रोग्राम वर्डस्टार का कोर्स का आयोजन किया और कहा कि मुझे उसमें भाग लेना ही पड़ेगा. तब पहली बार कम्प्यूटर को छुआ. तब लगा कि भाई इतना कठिन तो नहीं था, बल्कि आसान ही था.

1992-93 की बात है कि जब ईमेल का प्रयोग होने लगा था. मुझे भी कहा गया कि ईमेल के कोर्स में भाग लूँ, तो मैंने मना कर दिया. कहा कि सैकरेट्री सीख लेगी, मुझसे यह नयी नयी तकनीकें नहीं सीखी जातीं. तब आज के कम्प्यूटरों वाली बात नहीं थी, डास पर कैसे डायरेक्टरी देखी जाये, फारमेट की जाये, कोपी की जाये, सब याद करना पड़ता था.

बदलाव आया 1994 में जब अमरीका में इंटरनेट देखा, जाना कि लोग ईमेल से हर दिन भारत के समाचार पढ़ सकते थे. वापस इटली आये तो ईमेल इंटरनेट के बारे में सीखा भी, घर के लिए भी कम्प्यूटर लिया और इंडिया मेलिंग लिस्ट से भारत के समाचार पाने लगे.

उसके बाद का बड़ा बदलाव आया 2001 के पास जब अपनी बेवसाईट बनाने की सोची. हाँ, न करते करते कई महीने निकल गये, धीरे धीरे एच टी एम एल भाषा को सीखा और सृजन नाम से बेवसाईट बनी जो बाद में कल्पना में बदल गयी. 2005 में इँटरनेट के माध्यम से बने मित्रों ने, विषेशकर देबू ने ब्लाग बनाने में सहायता की, तो वे भी बन गये. धीरे धीरे कल्पना के पृष्ठ फैलते बढ़ते गये.

अब पिछले एक साल से परेशान हूँ. एच टी एम एल से कल्पना के नये पृष्ठ बनाना, कुछ भी बदलाव करना हो तो इतना समय लग जाता है कि कुछ अन्य करने का समय ही नहीं मिलता. जानकार लोग बोले, “यार तुम सी एस एस का प्रयोग क्यों नहीं करते? या फ़िर जुमला या वर्डप्रेस से कल्पना को चलाओ.” देबू और पंकज ने कुछ सलाह दीं. पर मन में वही बात आ जाती कि जाने मुझसे होगा या नहीं, यह नयी तकनीकें कैसे सीखूँगा? अपनी अक्षमता की बात के साथ मन में उम्र की बात भी जुड़ गयी है कि भैया अब अपनी उम्र देखो, अब नयी बातें सीखना उतना आसान नहीं.

खैर न न करते करते भी, सी एस एस पढ़ने लगा हूँ. शुरु शुरु में लगा कि यह तो अपनी समझ से बाहर की बात है, पर अब लगता है कि धीरे धीरे आ ही जायेगी. इसी चक्कर में इधर उधर जुमला, वर्डप्रेस आदि के बारे में कुछ जानकारी ली, तो सोचा कि सबसे आसान काम है इस चिट्ठे को बदलना. कल्पना पर जिस टेम्पलेट पर यह चल रहा है, वह 2006 में बना था, तबसे ब्लाग चलाने की तकनीकों में बदलाव आ गया है और चार सालों में लिखीं 396 पोस्ट के भार से बेचारा दबा हुआ है कि नयी पोस्ट जोड़ना कठिन हो गया है. इसलिए यह इस चिट्ठे की आखिरी पोस्ट है. इसके बाद सभी पोस्ट “जो न कह सके” के नये चिट्ठे पर ही होंगी. ”

नये “जो न कह सके” पर आप का स्वागत है.

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4 टिप्पणियाँ leave one →
  1. सितम्बर 30, 2009 1:41 पूर्वाह्न

    सुनील जी, नए चिट्ठे, नई जगह पर मुबारकबाद। पर मैं भी संजय की दी गई सलाह को दोहराऊँगा। एक कदम आगे चल रहे हैं, तो वर्डप्रेस को अपने होस्टिंग पर प्रयोग करे। डोमेन आप के पास है ही। कोई तकनीकी सहायता चाहिए तो बन्दा हाज़िर है, हालाँकि शायद मुझ तक नौबत न आए।

  2. Ashish permalink
    सितम्बर 30, 2009 7:41 पूर्वाह्न

    सुनील जी,

    आप कल्पना पर रहते हुये भी वर्डप्रेस का उपयोग कर सकते है| कल्पना पर पृष्ठो की सँख्या,विषयो की विविधता के साथ एकाधिक भाषाओ मे (अँग्रेजी, इतालीयन और हिन्दी भाषाओ) मे लेखो को देखते हुये जूमला बेहतर रहेगा! शुरुवात मे जूमला आपको मुश्किल लगेगा लेकिन १-२ सप्ताह बाद आपको यह आसान लगने लगेगा|

    एक निवेदन और आपको रोज पढने की आदत बनने के बाद महिने मे एक बार पढना अखरता है| सप्ताह मे कम से कम एक पोष्ट लिखते रहीये|
    आशीष

    • सितम्बर 30, 2009 7:49 पूर्वाह्न

      आशीष, रमण, सँजय, आप सबको सलाह और प्रेरणा के लिए धन्यवाद. पिछले एक साल से कुछ काम की वजह से और कुछ कल्पना के लिए कछुए के गति से काम करते करते, कुछ अन्य लिखने का समय कठिनाई से ही मिलता है. लेकिन कोशिश होगी कि जल्दी ही सप्ताह में कम से कम एक बार लिख सकूँ. लिखने की बातें तो मन में जाने कितनी उमड़ती रहती हैं पर दबी ही रह जातीं हैं.

  3. अक्टूबर 4, 2009 4:06 पूर्वाह्न

    वर्डप्रेस पर स्वागत । जिनके चिट्ठों पर आपके चिट्ठे की कड़ी है उन्हें उसे दुरुस्त कर लेना होगा। आशा है नये स्वरूप में ’कल्पना’ की पूरी पुरानी सामग्री भी शीघ्र ले आयेंगे ।

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